SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ममता बनर्जी खुद पहुंचीं अदालत; चुनाव आयोग से 9 फरवरी तक जवाब तलब

SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ममता बनर्जी खुद पहुंचीं अदालत; चुनाव आयोग से 9 फरवरी तक जवाब तलब

SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ममता बनर्जी खुद पहुंचीं अदालत; चुनाव आयोग से 9 फरवरी तक जवाब तलब
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Feb 04, 2026, 5:36:00 PM

पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर जारी विवाद पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस मामले में सबसे ज्यादा ध्यान इस बात पर रहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं कोर्ट में उपस्थित रहीं और उन्होंने अपने वकीलों के साथ मिलकर सीधे अदालत के सामने अपना पक्ष रखा।

ममता बनर्जी ने सुनवाई के दौरान आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल को चुनाव आयोग द्वारा जानबूझकर निशाने पर लिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जो प्रक्रिया सामान्य परिस्थितियों में लंबे समय में पूरी होनी चाहिए थी, उसे चुनाव से ठीक पहले बेहद कम समय में जल्दबाजी के साथ लागू किया जा रहा है। मुख्यमंत्री का कहना था कि यह कदम लोगों को जोड़ने के बजाय मतदाता सूची से हटाने की दिशा में बढ़ता नजर आ रहा है।

सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी को निर्देश दिया कि वे इस मामले में 9 फरवरी तक अपना जवाब दाखिल करें।

इस सुनवाई को ऐतिहासिक भी माना जा रहा है, क्योंकि यह दावा किया गया कि सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार किसी राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर अपनी दलीलें रखीं। आम तौर पर ऐसे मामलों में मुख्यमंत्रियों की ओर से उनके कानूनी सलाहकार या वरिष्ठ वकील ही अदालत में पक्ष रखते हैं।

सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने कहा कि चुनाव से ठीक पहले ऐसे समय में SIR प्रक्रिया शुरू की गई है, जब लोगों पर खेती-बाड़ी और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों का दबाव रहता है। उन्होंने दावा किया कि जिस काम को सामान्य तौर पर दो वर्षों में पूरा किया जाना था, उसे अब तीन महीने के भीतर पूरा करने का दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि 24 वर्षों बाद अचानक इतनी तेजी से इस प्रक्रिया को लागू करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई।

मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि SIR प्रक्रिया के कारण अब तक 100 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और चुनाव आयोग की सख्ती के चलते BLO यानी बूथ लेवल ऑफिसर पर अत्यधिक दबाव डाला जा रहा है। उन्होंने कहा कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना बताया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता में यह प्रक्रिया बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने का माध्यम बन गई है। ममता के मुताबिक अब तक करीब 58 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं।

ममता बनर्जी ने अदालत में यह आरोप भी लगाया कि भाजपा ने माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त कराए हैं, जो BLO के अधिकारों को दरकिनार करते हुए नाम हटाने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने मांग की कि नाम में मामूली अंतर या मिसमैच के आधार पर जारी किए गए नोटिस वापस लिए जाएं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि विवाह के बाद कई महिलाएं पति का उपनाम अपनाती हैं, जिससे नाम में बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन इसी कारण कई महिलाओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं।

वहीं, चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर जवाब देते हुए कहा कि SIR के काम को सही तरीके से पूरा करने के लिए उन्हें राज्य सरकार से बार-बार पर्याप्त अधिकारियों की मांग करनी पड़ी, लेकिन राज्य ने सहयोग नहीं किया। आयोग ने बताया कि उन्होंने क्लास-2 स्तर के अधिकारियों की मांग की थी, ताकि ERO यानी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर की नियुक्ति की जा सके। हालांकि राज्य सरकार ने उस स्तर के केवल करीब 80 अधिकारी उपलब्ध कराए और बाकी अधिकारी निचले रैंक के थे। चुनाव आयोग ने कहा कि इसी वजह से उन्हें मजबूरी में माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े।

चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी मतदाता को भेजे गए नोटिस बिना कारण नहीं होते और जिनके नाम हटाए गए, उन्हें अधिकृत एजेंटों के माध्यम से प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दी गई थी। आयोग ने दावा किया कि समय की कोई समस्या नहीं है और राज्य सरकार के सहयोग न करने के कारण उनके पास अन्य विकल्प नहीं बचा।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि असली मतदाता सूची में बने रहने चाहिए और किसी भी वास्तविक नागरिक को बाहर नहीं किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह भी कहा कि सभी नोटिस एक साथ वापस लेना व्यावहारिक नहीं होगा, लेकिन चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि केवल नाम की स्पेलिंग या छोटी-मोटी त्रुटियों के आधार पर नोटिस जारी न किए जाएं। कोर्ट ने चुनाव आयोग को अपने अधिकारियों को संवेदनशीलता के साथ काम करने के निर्देश देने को भी कहा।

पीठ ने यह सुझाव भी दिया कि यदि राज्य सरकार ऐसी टीम उपलब्ध कराए जो बांग्ला और स्थानीय बोलियों को बेहतर समझती हो, तो भाषा से जुड़ी गलतियों की पहचान और सुधार में मदद मिल सकती है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि स्थानीय भाषा के अनुवाद में AI के उपयोग के कारण त्रुटियां हो रही हैं, तो उसका समाधान निकाला जाएगा। कोर्ट ने दो टूक कहा कि तकनीकी या भाषाई कारणों से किसी वास्तविक मतदाता को मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।