दिल्ली की चर्चित शराब नीति से जुड़े मामले में कानूनी और राजनीतिक घटनाक्रम ने एक अप्रत्याशित दिशा ले ली है। आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट की एक विशेष बेंच के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें इस अदालत से निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद नहीं दिखती, इसलिए उन्होंने विरोध के तौर पर न्यायिक प्रक्रिया में शामिल न होने का फैसला किया है।
यह स्थिति तब उत्पन्न हुई जब 20 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल और अन्य आरोपियों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जज के मामले से अलग होने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने अदालत की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए ‘रिक्यूजल’ की अपील की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि बिना ठोस आधार के न्यायपालिका पर पक्षपात के आरोप स्वीकार्य नहीं हैं।
इसके बाद केजरीवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो संदेश जारी कर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उनकी अंतरात्मा उन्हें इस फैसले के लिए प्रेरित कर रही है और उन्होंने महात्मा गांधी के सिद्धांतों का हवाला देते हुए इसे ‘सत्याग्रह’ बताया। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे कानूनी विकल्पों को पूरी तरह बंद नहीं कर रहे हैं और हाईकोर्ट के अंतिम फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अधिकार सुरक्षित रखेंगे।
मामले की पृष्ठभूमि में दिल्ली सरकार की शराब नीति से जुड़े कथित अनियमितताओं का आरोप है। इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल सहित 23 आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की, जिस पर फिलहाल सुनवाई जारी है।