ईरान में चल रही जंग का असर अब धीरे-धीरे पूरी दुनिया पर दिखने लगा है, खासकर एशिया के कई देशों में ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है। तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होने के कारण कम से कम 9 एशियाई देशों में हालात बिगड़ने लगे हैं। कई सरकारों को ईंधन बचाने और संकट से निपटने के लिए सख्त फैसले लेने पड़ रहे हैं।
सबसे ज्यादा असर थाईलैंड में देखने को मिल रहा है। वहां की सरकार ने सरकारी दफ्तरों में ऊर्जा बचाने के लिए कई अहम निर्देश जारी किए हैं। कर्मचारियों को अब दफ्तरों में लिफ्ट का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया है और उन्हें सीढ़ियों का इस्तेमाल करने को कहा गया है। इतना ही नहीं, कर्मचारियों को सूट-टाई जैसे औपचारिक कपड़े पहनने से भी मना किया गया है ताकि एयर कंडीशनर का इस्तेमाल कम किया जा सके और बिजली की बचत हो।
थाईलैंड सरकार ने कर्मचारियों को शॉर्ट स्लीव शर्ट पहनने की सलाह दी है और दफ्तरों में एयर कंडीशनर का तापमान 26 से 27 डिग्री सेल्सियस के बीच रखने का निर्देश दिया गया है। इसके अलावा कई कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम करने के लिए भी कहा गया है, ताकि ऊर्जा की खपत कम की जा सके।
थाईलैंड के प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल ने अधिकारियों को ऊर्जा बचाने के लिए जरूरी कदम तुरंत लागू करने के निर्देश दिए हैं। सरकार ने विदेश यात्राओं पर भी अस्थायी रोक लगा दी है। ऊर्जा मंत्री के मुताबिक फिलहाल देश के पास करीब 95 दिन का ऊर्जा भंडार बचा हुआ है।
दूसरी तरफ पाकिस्तान में भी हालात गंभीर होते जा रहे हैं। वहां सरकार ने खर्च कम करने के लिए मंत्रियों की सैलरी और विदेश यात्राओं पर रोक लगा दी है। साथ ही सरकारी खर्च और ईंधन के उपयोग में भी कटौती करने के फैसले लिए गए हैं।
दरअसल इस संकट की सबसे बड़ी वजह ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रही जंग है। इस टकराव के कारण होर्मुज स्ट्रेट बंद हो गया है, जिससे तेल की सप्लाई पूरी तरह प्रभावित हो गई है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का एक बेहद अहम समुद्री रास्ता है और हर साल दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है।
अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में कई देशों को और कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं। थाईलैंड सरकार ने चेतावनी दी है कि जरूरत पड़ने पर दुकानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों के विज्ञापन बोर्ड की रोशनी कम की जा सकती है और पेट्रोल पंपों को रात 10 बजे तक बंद करने जैसे फैसले भी लिए जा सकते हैं।
यानी साफ है कि ईरान की जंग अब सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका असर दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ने लगा है।