बंगाल में जांच बनाम सत्ता की जंग, ईडी ने खटखटाया शीर्ष अदालत का दरवाजा

बंगाल में जांच बनाम सत्ता की जंग, ईडी ने खटखटाया शीर्ष अदालत का दरवाजा

बंगाल में जांच बनाम सत्ता की जंग, ईडी ने खटखटाया शीर्ष अदालत का दरवाजा
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Jan 12, 2026, 4:40:00 PM

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में पश्चिम बंगाल की स्थिति को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। केंद्रीय एजेंसी का कहना है कि राज्य में कानून लागू करने की जिम्मेदारी संभालने वाले ही कथित तौर पर ऐसे संज्ञेय अपराधों में लिप्त हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014) फैसले के अनुसार अनिवार्य रूप से प्राथमिकी दर्ज होनी चाहिए।

ईडी ने अपनी याचिका में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) और कोलकाता पुलिस आयुक्त के खिलाफ स्वतंत्र सीबीआई जांच कराने की मांग की है। एजेंसी का आरोप है कि हाल ही में राजनीतिक परामर्श संस्था I-PAC से जुड़े ठिकानों पर चल रही मनी लॉन्ड्रिंग जांच के दौरान इन अधिकारियों ने न सिर्फ जांच में बाधा डाली, बल्कि दस्तावेज़ और डिजिटल साक्ष्य जबरन अपने कब्जे में ले लिए और ईडी अधिकारियों को अवैध रूप से रोके रखा।

160 पन्नों की याचिका में गंभीर आरोप
सुप्रीम कोर्ट में दायर 160 पेज की याचिका में ईडी ने कहा है कि यह मामला असाधारण और दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों को उजागर करता है, जहां स्वयं राज्य के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग कथित अपराधों में शामिल बताए जा रहे हैं। एजेंसी का दावा है कि इन्हीं हालात के चलते उसे सीधे शीर्ष अदालत का रुख करना पड़ा।

ईडी के अनुसार, वह एक बहु-राज्यीय मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क की जांच कर रही है, जिसमें अवैध कोयला खनन से करीब 2742.32 करोड़ रुपये की कमाई की गई और इस काले धन को वैध आय के रूप में दर्शाया गया। इसी सिलसिले में I-PAC के निदेशक प्रतीक जैन से जुड़े परिसरों पर तलाशी अभियान चलाया गया था, जहां कथित तौर पर 20 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध आय के सबूत मिलने की बात कही गई है।

तलाशी के दौरान जबरन हस्तक्षेप का आरोप
याचिका में आरोप लगाया गया है कि तलाशी के दौरान मुख्यमंत्री स्वयं, DGP, कोलकाता पुलिस कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर समेत कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ वहां पहुंचीं और बिना अनुमति कार्रवाई स्थल में प्रवेश कर गईं। ईडी का कहना है कि इस दौरान उसके अधिकारियों को डराया गया, उनसे जब्त की जा रही फाइलें, मोबाइल फोन और लैपटॉप छीन लिए गए और दस्तावेज़ों से भरा एक वाहन परिसर से बाहर ले जाया गया।

एजेंसी ने यह भी कहा कि चूंकि जिन अधिकारियों पर आरोप हैं, वही राज्य की कानून-व्यवस्था और पुलिस तंत्र को नियंत्रित करते हैं, ऐसे में स्थानीय पुलिस से निष्पक्ष एफआईआर की उम्मीद करना व्यर्थ होगा। याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि मुख्यमंत्री राज्य की गृह मंत्री भी हैं, जिनके अधीन पुलिस विभाग कार्य करता है।

संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का दावा
ईडी ने आरोप लगाया कि तलाशी के दौरान उसके अधिकारियों को रोके जाने से उनके मौलिक अधिकारों का हनन हुआ, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हुई। साथ ही, एजेंसी ने अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए राज्य सरकार की ओर से संभावित दुर्भावनापूर्ण आपराधिक मामलों और धमकी से संरक्षण की मांग की है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 310 के तहत डकैती जैसे गंभीर अपराध भी बनते हैं, जिनमें न्यूनतम सात साल की सजा का प्रावधान है।

I-PAC की राजनीतिक भूमिका का उल्लेख
ईडी ने याचिका में यह भी उल्लेख किया है कि I-PAC वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से ही तृणमूल कांग्रेस से जुड़ा रहा है और आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की रणनीति तैयार करने में भूमिका निभा रहा है।

कुल मिलाकर, ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से इस पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र सीबीआई जांच के आदेश देने की अपील की है और इसे राज्य में कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती बताया है।