ग्रामीण विकास की आधारशिला मानी जाने वाली ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) को अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए गठित एक समिति ने इसके मौजूदा ढांचे में कई गंभीर कमियों की पहचान की है। समिति के अनुसार, सीमित जनभागीदारी, स्थानीय आंकड़ों के अपर्याप्त इस्तेमाल, विभागों के बीच समन्वय की कमी और जवाबदेही की कमजोर व्यवस्था के कारण यह योजना अक्सर जमीनी जरूरतों को पूरा करने के बजाय एक औपचारिक प्रक्रिया तक सिमट जाती है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए समिति ने व्यापक सुधारों का खाका पेश किया है, जिसका उद्देश्य GPDP को अधिक समावेशी, साक्ष्य-आधारित और प्रभावशाली बनाना है। रिपोर्ट में ग्राम सभा की भूमिका को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया है, ताकि स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो सके। इसके तहत महिलाओं, अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य वंचित वर्गों को योजना निर्माण में प्राथमिकता से शामिल करने की सिफारिश की गई है।
समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि विकास योजनाओं को वास्तविक जरूरतों के अनुरूप बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों का बेहतर उपयोग अनिवार्य है। इसके साथ ही विभिन्न सरकारी योजनाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित कर संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग और दोहराव को रोकने पर बल दिया गया है।
रिपोर्ट में विकास के संतुलित दृष्टिकोण की भी वकालत की गई है। समिति का मानना है कि केवल आधारभूत ढांचे के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, ग्राम पंचायतों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के लिए उनके स्वयं के राजस्व स्रोतों को बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।
पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए समिति ने सोशल ऑडिट, सार्वजनिक सूचना साझा करने और सामुदायिक निगरानी जैसे उपायों को अनिवार्य बनाने की सिफारिश की है। परियोजनाओं से संबंधित जानकारी को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने और नागरिकों के लिए शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने पर भी बल दिया गया है।
पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज ने कहा कि GPDP को केवल औपचारिक प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे जमीनी स्तर पर वास्तविक बदलाव लाने के माध्यम के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि योजनाओं के तहत परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए उचित योजना बनाना संसाधनों की बर्बादी को रोकने में सहायक होगा।
रिपोर्ट में नियोजन और निगरानी प्रक्रियाओं को मजबूत करने के लिए कई ठोस सुझाव दिए गए हैं। योजना निर्माण के प्रत्येक चरण के लिए विस्तृत चेकलिस्ट तैयार करने की बात कही गई है, ताकि डेटा संग्रह से लेकर सामुदायिक परामर्श तक हर कदम का सही तरीके से पालन हो सके। साथ ही बदलती जरूरतों के अनुसार पूरक योजनाएं जोड़ने की भी अनुमति देने की बात कही गई है।
जवाबदेही को संस्थागत रूप देने के लिए सोशल ऑडिट, परियोजनाओं की सूची वाले सूचना बोर्ड और समुदाय-आधारित निगरानी तंत्र को लागू करने की सिफारिश की गई है। स्वयं सहायता समूहों, नागरिक समाज संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी से निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने का सुझाव भी दिया गया है।
ग्राम सभा को सशक्त बनाने के लिए नवाचारों पर भी जोर दिया गया है। इसमें बैठकों के व्यापक प्रचार-प्रसार, स्वयं सहायता समूहों को ‘पार्टिसिपेटरी रूरल अप्रेजल’ तकनीकों में प्रशिक्षित करने, बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ‘बाल सभाएं’ आयोजित करने और प्रवासी लोगों को जोड़ने के लिए हाइब्रिड बैठकों का आयोजन शामिल है।
तकनीकी मोर्चे पर, योजना प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाने की सिफारिश की गई है। इसमें जियो-टैगिंग, जीआईएस आधारित निगरानी प्रणाली और विजुअल डैशबोर्ड जैसे उपकरणों का उपयोग शामिल है। इसके अलावा, एआई आधारित प्रणालियों के जरिए समुदाय तक जानकारी पहुंचाने और प्रशिक्षण के लिए वीडियो सामग्री उपलब्ध कराने की बात भी कही गई है।
समिति का मानना है कि इन सुधारों के माध्यम से GPDP को एक साधारण योजना प्रक्रिया से आगे बढ़ाकर ग्रामीण विकास के लिए एक सशक्त और परिवर्तनकारी उपकरण बनाया जा सकता है, जो स्थानीय समुदायों को विकास प्रक्रिया के केंद्र में स्थापित करेगा।