कारगिल युद्ध के दौरान अदम्य साहस का परिचय देने वाले महावीर चक्र विजेता कर्नल सोनम वांगचुक का शुक्रवार को लद्दाख स्थित उनके आवास पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। 61 वर्षीय वांगचुक भारतीय सेना के उन चुनिंदा अधिकारियों में गिने जाते थे, जिन्होंने कठिनतम परिस्थितियों में भी असाधारण नेतृत्व और बहादुरी दिखाई।
कर्नल वांगचुक को विशेष रूप से 1999 के कारगिल युद्ध में बटालिक सेक्टर में उनके नेतृत्व के लिए जाना जाता है। ‘लद्दाख का शेर’ कहे जाने वाले इस वीर अधिकारी ने चोरबत ला क्षेत्र में अपनी रणनीतिक समझ और साहसिक कार्रवाई से युद्ध की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि देश ने एक ऐसे सैनिक को खो दिया है, जिसकी पहचान साहस, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण से जुड़ी थी। उन्होंने अपने संदेश में वांगचुक को लद्दाख की आत्मा का प्रतीक बताते हुए कहा कि उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
भारतीय सेना ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि कर्नल वांगचुक केवल एक वीर सैनिक ही नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक नेता भी थे। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी सहित सभी रैंकों ने उनके योगदान को याद करते हुए शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।
27 जनवरी 1964 को लेह के शंकर क्षेत्र में जन्मे वांगचुक ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में प्राप्त की। बाद में उन्होंने श्री वेंकटेश्वर कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन देशसेवा के जुनून के चलते पढ़ाई अधूरी छोड़कर 1987 में भारतीय सेना में शामिल हो गए। उन्हें प्रारंभ में असम रेजिमेंट में कमीशन मिला और बाद में लद्दाख स्काउट्स का हिस्सा बने, जिसे ‘स्नो वॉरियर्स’ के नाम से जाना जाता है।
कारगिल युद्ध के दौरान मई 1999 में उन्हें नियंत्रण रेखा के पास ऊंचाई वाले इलाके में एक महत्वपूर्ण ऑब्जर्वेशन पोस्ट स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। बेहद खराब मौसम, बर्फ से ढकी ऊंची चोटियों और दुश्मन की गोलीबारी के बीच उन्होंने अपनी छोटी टीम के साथ आगे बढ़ते हुए मोर्चा संभाला।
30 मई को हुई पहली मुठभेड़ में उन्होंने दुश्मन को करारा जवाब दिया। इसके बाद उन्हें एक और संवेदनशील पोस्ट की जिम्मेदारी दी गई, जहां संभावित हमले की आशंका थी। पूरी रात कठिन परिस्थितियों में मार्च कर वे समय से पहले वहां पहुंचे और अपनी टीम को रणनीतिक रूप से तैनात किया। इसके बाद उन्होंने दुश्मन के कब्जे वाले ठिकाने पर हमला बोलकर छह सैनिकों को ढेर कर दिया और उस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उनकी इस कार्रवाई ने युद्ध में निर्णायक मोड़ ला दिया।
उनकी वीरता के सम्मान में उस क्षेत्र की दो चौकियों का नाम ‘सोनम-1’ और ‘सोनम-2’ रखा गया। देश के दूसरे सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित वांगचुक लद्दाख में साहस और गौरव का प्रतीक माने जाते थे।
कर्नल सोनम वांगचुक की कहानी न केवल सैन्य इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि यह उन सैनिकों के अदम्य जज्बे का प्रतीक भी है, जो दुनिया के सबसे कठिन इलाकों में देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं।