‘सम्मान के साथ मरने के अधिकार’ पर ऐतिहासिक फैसला! 13 साल से वेजिटेटिव स्टेट में पड़े युवक को सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी

‘सम्मान के साथ मरने के अधिकार’ पर ऐतिहासिक फैसला! 13 साल से वेजिटेटिव स्टेट में पड़े युवक को सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी

‘सम्मान के साथ मरने के अधिकार’ पर ऐतिहासिक फैसला! 13 साल से वेजिटेटिव स्टेट में पड़े युवक को सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Mar 11, 2026, 5:37:00 PM

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी है। राणा पिछले लगभग 13 वर्षों से स्थायी वानस्पतिक अवस्था (Persistent Vegetative State) में हैं। न्यायालय ने माना कि ऐसी परिस्थितियों में मरीज को कृत्रिम जीवन समर्थन से मुक्त कर सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार दिया जा सकता है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि यह फैसला 2018 में दिए गए ‘कॉमन कॉज बनाम भारत सरकार’ मामले के सिद्धांतों का पहला व्यावहारिक अनुप्रयोग है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मौलिक अधिकारों के दायरे में स्वीकार किया था।

हरीश राणा वर्ष 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे, जब वह अपने पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल से गिर गए। इस दुर्घटना में उनके सिर में गंभीर चोट आई और तब से वे पूरी तरह बिस्तर पर हैं। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार दुर्घटना के बाद उन्हें 100 प्रतिशत क्वाड्रिप्लेजिया हो गया और वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में चले गए। पिछले 13 वर्षों में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

राणा की जीवन-रक्षा एक सर्जरी के माध्यम से लगाए गए PEG ट्यूब के जरिए दी जाने वाली चिकित्सकीय पोषण प्रणाली (Clinically Administered Nutrition – CAN) पर निर्भर रही है। वे सांस लेने के लिए ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब और अन्य कृत्रिम चिकित्सा उपकरणों के सहारे जीवित हैं।

परिवार की अपील और अदालत की प्रक्रिया

राणा के माता-पिता ने यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट से जीवनरक्षक सहायता हटाने की अनुमति मांगी थी कि उनका बेटा लगातार पीड़ा में है और उसकी हालत में सुधार की कोई संभावना नहीं है। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी तथा परिवार की ओर से अधिवक्ता रश्मि नंदकुमार की दलीलें सुनीं।

सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने स्वयं राणा के माता-पिता और छोटे भाई से मुलाकात की। परिवार ने अदालत को बताया कि वे नहीं चाहते कि उनका बेटा अनावश्यक कष्ट झेलता रहे। अदालत ने अपने आदेश में परिवार के समर्पण और वर्षों तक की गई देखभाल की सराहना भी की।

मेडिकल बोर्ड की राय निर्णायक

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड गठित किए थे। दोनों बोर्डों ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि राणा के स्वस्थ होने की संभावना बेहद कम है और उनकी हालत में लंबे समय से कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया है।

मरीज के परिजनों और मेडिकल बोर्डों की संयुक्त राय के आधार पर अदालत ने कहा कि क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन को जारी रखना अब मरीज के हित में नहीं है।

अदालत की टिप्पणी: परिवार ने नहीं छोड़ा साथ

फैसला सुनाते हुए जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि यह मामला मानव संवेदना और पारिवारिक समर्पण का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी मृत्यु नहीं बल्कि अकेले छोड़ दिया जाना है, जबकि राणा के परिवार ने कठिन परिस्थितियों में भी उनका साथ नहीं छोड़ा। अदालत ने अपने आदेश में कुछ महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए:

  • -मरीज को दी जा रही चिकित्सा सहायता, जिसमें क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन भी शामिल है, को बंद किया जाएगा।

  • -ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) राणा को अपने पैलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती करेगा ताकि जीवनरक्षक प्रणाली हटाने की प्रक्रिया गरिमा के साथ पूरी की जा सके।

  • -मरीज को घर से अस्पताल तक स्थानांतरित करने की सभी व्यवस्थाएं AIIMS उपलब्ध कराएगा।

  • -जीवन समर्थन हटाने की प्रक्रिया एक सुव्यवस्थित योजना के तहत की जाएगी ताकि मरीज की गरिमा बनी रहे।

  • सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट को निर्देश दिया है कि वे अपने अधीनस्थ न्यायिक मजिस्ट्रेटों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहें कि अस्पतालों में ‘कॉमन कॉज’ फैसले के दिशानिर्देशों का पालन किया जाए। इसके अलावा केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया है कि प्रत्येक जिले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड के लिए पंजीकृत डॉक्टरों का पैनल तैयार रखें।

पैसिव यूथेनेशिया का कानूनी आधार

साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ‘कॉमन कॉज’ मामले में अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी थी। इस फैसले में पैसिव यूथेनेशिया के लिए स्पष्ट प्रक्रिया तय की गई थी, जिसमें प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड की सहमति आवश्यक होती है।

जनवरी 2023 में अदालत ने इन प्रक्रियाओं को और सरल बनाते हुए एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव लागू करने की व्यवस्था को भी आसान किया था।

मामले की टाइमलाइन

  • 2024: राणा के परिवार ने सबसे पहले दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।

  • अगस्त 2024: सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक याचिका सुनने से इनकार किया, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार को इलाज का खर्च वहन करने को कहा।

  • 2025: स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ने की जानकारी के साथ पुनः आवेदन दायर किया गया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल जांच के लिए बोर्ड गठित किया।

  • 2026: दोनों मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और परिवार की सहमति के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी।

इस फैसले को भारत में इच्छामृत्यु से जुड़े कानूनी ढांचे के व्यावहारिक क्रियान्वयन की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है, जो गंभीर और असाध्य स्थिति में पड़े मरीजों के अधिकारों और उनकी गरिमा पर व्यापक बहस को आगे बढ़ाता है।