झारखंड की संथाल और उरांव जनजातियों की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने का विषय अब संसद तक पहुंच गया है। झारखंड से भाजपा के राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने राज्यसभा में दोनों जनजातियों की विरासत को बचाने और उसे विकसित करने की जरूरत पर जोर देते हुए एक विशेष सांस्कृतिक कॉरिडोर बनाने की मांग उठाई है।
सांसद दीपक प्रकाश ने कहा कि संथाल और उरांव समाज की संस्कृति अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है, जिसे संरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि झारखंड और बिहार की सीमा में स्थित ऐतिहासिक स्थलों रोहतासगढ़, मुड़मा और मरांग बुरु को जोड़कर एक विशिष्ट सांस्कृतिक कॉरिडोर विकसित किया जाए।
सांसद ने संसद में आदिवासी अस्मिता और विरासत की अहमियत को रेखांकित करते हुए काव्य पंक्तियां भी पढ़ीं। उन्होंने कहा,
"जहां पुरखों की खुशबू है, जहां आस्था का डेरा है,
वो रोहतासगढ़, वो मुड़मा, वो मारंग बुरु, पहचान का सवेरा है।"
दीपक प्रकाश ने बताया कि बिहार का रोहतासगढ़ उरांव समाज के शौर्य, संघर्ष और पूर्वजों की स्मृतियों का प्रतीक स्थल माना जाता है। वहीं रांची जिले के मांडर क्षेत्र में स्थित मुड़मा स्थल को उन्होंने धार्मिक शक्ति खूंटा का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह आदिवासी समाज की पारंपरिक ‘पड़हा शासन व्यवस्था’ की उत्पत्ति से भी जुड़ा हुआ है।
उन्होंने यह भी कहा कि पारसनाथ क्षेत्र में स्थित मरांग बुरु संथाल समुदाय के लिए सर्वोच्च देवता के रूप में पूजनीय है। उनके अनुसार यह सिर्फ एक पहाड़ नहीं, बल्कि संथाल समाज की आस्था और अस्तित्व की पहचान है।
राज्यसभा सांसद ने अफसोस जताते हुए कहा कि इतनी महत्वपूर्ण और वैश्विक स्तर की धरोहरें आज भी सड़क, बिजली और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रही हैं।
उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि रोहतासगढ़, मुड़मा और मरांग बुरु को जोड़कर एक विशेष सांस्कृतिक कॉरिडोर बनाया जाए, ताकि देश ही नहीं बल्कि दुनिया भी भारत की आदिवासी सभ्यता, संस्कृति और गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सके।