झारखंड में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध और विशेष रूप से ‘डायन प्रथा’ जैसी कुप्रथा को खत्म करने के लिए न्यायपालिका ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। रांची स्थित झारखंड न्यायिक अकादमी के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ऑडिटोरियम में शनिवार को आयोजित एक उच्चस्तरीय कोलोकीयम में देश और राज्य के वरिष्ठ न्यायाधीशों ने इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय संविधान महिलाओं को समानता और सम्मानजनक जीवन का अधिकार प्रदान करता है, लेकिन वास्तविकता में इन अधिकारों का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘डायन प्रथा’ महज अंधविश्वास का परिणाम नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त असमानता, पितृसत्तात्मक सोच और शक्ति के दुरुपयोग से जुड़ी एक गंभीर समस्या है।
न्यायमूर्ति नाथ ने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा को केवल कानूनी नजरिए से नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे सामाजिक ढांचे की गहराई में मौजूद समस्या के रूप में समझना होगा। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और सामाजिक जागरूकता को इस बुराई के उन्मूलन के लिए आवश्यक बताया। साथ ही, उन्होंने कहा कि न्याय प्रणाली की जिम्मेदारी केवल दोषियों को दंडित करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि पीड़ितों के पुनर्वास और उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाने पर भी ध्यान देना जरूरी है।
इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि महिलाओं से जुड़े अपराधों को रोकने के लिए पर्याप्त कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन उनकी प्रभावी पालना सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने जिला स्तर पर कानूनी संस्थाओं को अधिक सक्रिय बनाने की आवश्यकता बताई और लंबित मामलों के त्वरित निपटारे पर जोर दिया। उनके अनुसार, सही पदों पर सक्षम व्यक्तियों की नियुक्ति और पारदर्शी कार्यप्रणाली से ही बदलाव संभव है।
कार्यक्रम में झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.एस. रामचंद्र राव (या संबंधित नाम के अनुसार) सहित कई न्यायिक अधिकारी और गणमान्य लोग मौजूद रहे। चर्चा के दौरान यह भी निर्णय लिया गया कि कानूनी सहायता सेवाओं को ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तारित किया जाएगा, ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय, मुआवजा और सुरक्षा मिल सके।
कोलोकीयम के दौरान विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों से जुड़ी महिलाओं और दुर्घटना व गंभीर बीमारियों से प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता भी प्रदान की गई। समापन सत्र में महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव उमाशंकर सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन देते हुए आश्वस्त किया कि न्यायपालिका द्वारा दिए गए सुझावों को सरकारी स्तर पर लागू करने के लिए ठोस पहल की जाएगी।