राज्यसभा चुनाव से पहले झारखंड में बढ़ी सियासी हलचल, झामुमो के ‘61’ दावे ने बढ़ाया रहस्य
राज्यसभा चुनाव से पहले झारखंड में बढ़ी सियासी हलचल, झामुमो के ‘61’ दावे ने बढ़ाया रहस्य
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए 18 जून को होने वाले मतदान से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी के मैदान में आने के बाद चुनावी मुकाबला अब सीधे नहीं बल्कि त्रिकोणीय स्वरूप ले चुका है। इससे सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए राजनीतिक समीकरण अधिक चुनौतीपूर्ण हो गए हैं।
विधानसभा की मौजूदा संख्या के आधार पर राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता है। इस हिसाब से दो सीटों के लिए 56 मत पर्याप्त माने जा रहे हैं। हालांकि नाथवानी की उम्मीदवारी ने वोटों के संभावित बंटवारे और क्रॉस-वोटिंग की चर्चाओं को हवा दे दी है। एनडीए के पास फिलहाल 24 विधायक हैं, जबकि सत्ता पक्ष अपने समर्थन के आंकड़े को लेकर लगातार आत्मविश्वास जताता रहा है।
इसी बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के एक दावे ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। पार्टी की ओर से सोशल मीडिया पर जारी संदेश में “56 नहीं, 61” का उल्लेख किया गया। इसके बाद झामुमो महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने भी इसी संख्या वाला एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि महागठबंधन को 61 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि यह अतिरिक्त समर्थन किन विधायकों या दलों से मिल रहा है।
झामुमो के इस दावे के बाद राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र यह सवाल बन गया है कि क्या महागठबंधन ने विपक्षी खेमे में किसी प्रकार की सेंध लगाने में सफलता हासिल की है। फिलहाल किसी विधायक के समर्थन बदलने की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन अटकलों का दौर लगातार जारी है।
उधर, एनडीए भी अपने विधायकों को एकजुट रखने की रणनीति पर काम कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, मतदान से पहले पार्टी ने अपने विधायकों के लिए रांची के एक होटल में ठहरने की व्यवस्था की है और कई विधायक वहां पहुंच चुके हैं। इसे संभावित राजनीतिक गतिविधियों के बीच संगठनात्मक सतर्कता के रूप में देखा जा रहा है।
नाथवानी की उम्मीदवारी घोषित होने के बाद कांग्रेस ने संभावित हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका भी व्यक्त की थी। पार्टी नेताओं ने इस मुद्दे को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के समक्ष उठाया था। ऐसे में झामुमो का “61” वाला दावा केवल संख्या भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राजनीतिक संदेश और शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है।
मतदान की तारीख नजदीक आने के साथ राज्य की राजनीति में उत्सुकता बढ़ गई है। अब सबकी निगाहें 18 जून के मतदान और उसके नतीजों पर टिकी हैं, जो यह स्पष्ट करेंगे कि झामुमो के दावे के पीछे वास्तविक राजनीतिक गणित क्या है और चुनावी मुकाबले में किस पक्ष को बढ़त मिलती है।