बिना नवीकरण वाले फार्मासिस्टों पर कार्रवाई की तैयारी, 15 दिन में जवाब नहीं देने पर रद्द हो सकता है रजिस्ट्रेशन
बिना नवीकरण वाले फार्मासिस्टों पर कार्रवाई की तैयारी, 15 दिन में जवाब नहीं देने पर रद्द हो सकता है रजिस्ट्रेशन
झारखंड सरकार के अधीन कार्यरत झारखंड स्टेट फार्मेसी काउंसिल ने लंबे समय से पंजीकरण नवीकरण नहीं कराने वाले फार्मासिस्टों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। काउंसिल ने स्पष्ट किया है कि जिन फार्मासिस्टों ने दो वर्ष या उससे अधिक समय से अपना रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं कराया है, उनका पंजीकरण निरस्त किया जा सकता है।
इस संबंध में काउंसिल के निबंधक सह सचिव प्रशांत कुमार पांडेय द्वारा आदेश जारी कर संबंधित फार्मासिस्टों से 15 दिनों के भीतर स्पष्टीकरण मांगा गया है। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया है कि वार्षिक नवीकरण अनिवार्य है और तय समयसीमा में जवाब नहीं मिलने की स्थिति में यह माना जाएगा कि संबंधित फार्मासिस्ट को प्रस्तावित कार्रवाई पर कोई आपत्ति नहीं है। इसके बाद काउंसिल नियमानुसार आगे की कार्रवाई कर सकेगी।
काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड स्टेट फार्मेसी काउंसिल में कुल 16,787 फार्मासिस्ट पंजीकृत हैं। इनमें से लगभग 2500 फार्मासिस्ट ऐसे हैं, जिन्होंने अब तक अपना निबंधन नवीकृत नहीं कराया है। इसके अलावा बड़ी संख्या में ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहाँ फार्मासिस्टों का पंजीकरण एक साथ दो अलग-अलग राज्यों की फार्मेसी काउंसिल में दर्ज है, जबकि नियमानुसार बिना स्थानांतरण के ऐसा करना प्रतिबंधित है।
ऑनलाइन प्रक्रिया में तकनीकी दिक्कतों की शिकायत
फार्मासिस्टों का कहना है कि नवीकरण की ऑनलाइन प्रक्रिया में लगातार तकनीकी समस्याएँ सामने आ रही हैं। रिम्स में लगभग तीन दशक तक सेवा देने के बाद वर्ष 2016 में सेवानिवृत्त हुए फार्मासिस्ट अरबिंद प्रसाद सिंह ने बताया कि उनका निबंधन दिसंबर 2025 तक मान्य है, फिर भी पिछले कई दिनों से ऑनलाइन नवीकरण के प्रयास में उन्हें ओटीपी प्राप्त नहीं हो रहा है।
उनका दावा है कि यह परेशानी केवल उनकी नहीं, बल्कि राज्य भर के हजारों फार्मासिस्टों की है। कई फार्मासिस्टों का आरोप है कि जानबूझकर ओटीपी प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न की जाती है, ताकि उन्हें काउंसिल कार्यालय आने के लिए विवश होना पड़े।
कुछ फार्मासिस्टों ने काउंसिल कार्यालय पर यह आरोप भी लगाए हैं कि बिना कथित ‘चढ़ावा’ दिए न तो नया निबंधन सुचारु रूप से होता है और न ही नवीकरण की प्रक्रिया पूरी की जाती है। इसी वजह से कई फार्मासिस्ट कार्यालय जाने से परहेज करते हैं।
काउंसिल ने आरोपों को किया खारिज
इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए निबंधक सह सचिव प्रशांत कुमार पांडेय ने सभी दावों को निराधार बताया। उन्होंने कहा कि फार्मासिस्ट अपनी लापरवाही का दोष काउंसिल पर मढ़ रहे हैं। उनका कहना है कि निबंधन और नवीकरण शुल्क ही काउंसिल की आय का मुख्य स्रोत है, ऐसे में नवीकरण नहीं होने से सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है और सटीक डेटा भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
ओटीपी संबंधी शिकायतों पर उन्होंने स्पष्ट किया कि पहली बार ऑनलाइन पंजीकरण या नवीकरण के समय जारी किए गए पासवर्ड को कई फार्मासिस्ट सुरक्षित नहीं रखते, जिससे बाद में तकनीकी दिक्कतें आती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि फोन पर ओटीपी देने में सावधानी बरती जाती है, क्योंकि कई फार्मासिस्ट दवा दुकानों से जुड़े होते हैं और फोन पर यह पहचान करना कठिन होता है कि कॉल करने वाला वास्तव में पंजीकृत फार्मासिस्ट है या कोई अन्य व्यक्ति।