झारखंड के मरीजों के लिए राहत भरी खबर है। राज्य में किडनी प्रत्यारोपण की सुविधा शुरू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) और राज हॉस्पिटल को किडनी ट्रांसप्लांट का लाइसेंस देने पर सरकार की सहमति बन गई है। औपचारिक प्रक्रिया पूरी होते ही दोनों संस्थानों को लाइसेंस जारी कर दिया जाएगा, जिससे मरीजों को इलाज के लिए दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ेगा।
यह महत्वपूर्ण निर्णय स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह की अध्यक्षता में आयोजित परामर्शदात्री समिति की बैठक में लिया गया। यह समिति मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम के तहत गठित है। बैठक में सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से रिम्स और राज हॉस्पिटल को किडनी प्रत्यारोपण की अनुमति देने का समर्थन किया।
बैठक में अपर सचिव विद्यानंद शर्मा पंकज, सेवानिवृत्त प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश शिवनारायण सिंह, निदेशक प्रमुख स्वास्थ्य सेवाएं डॉ. सिद्धार्थ सान्याल, डॉ. संजय कुमार, रिम्स के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. प्रकाश, नेफ्रोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. प्रज्ञा घोष पंत, उप सचिव ध्रुव प्रसाद सहित गैर सरकारी संगठनों की प्रतिनिधि सरिता पांडेय और प्रगति शंकर मौजूद रहीं।
अधिकारियों ने बताया कि तय मानकों और प्रक्रियाओं को अंतिम रूप देते ही लाइसेंस जारी कर दिए जाएंगे। इसके बाद राज्य में अंग प्रत्यारोपण सेवाओं का दायरा बढ़ेगा और गंभीर किडनी रोगियों को स्थानीय स्तर पर बेहतर इलाज उपलब्ध हो सकेगा।
बैठक के दौरान राज्य के अन्य सरकारी और निजी अस्पतालों में भी किडनी के साथ-साथ लिवर और हार्ट ट्रांसप्लांट शुरू करने की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई। इस विषय पर आगे की रणनीति तय करने के लिए 15 जनवरी को राज्य के 10 मेडिकल कॉलेजों के साथ एक विशेष बैठक आयोजित करने का फैसला लिया गया है।
अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री गंभीर बीमारी उपचार योजना के तहत राज्य से बाहर भेजे जाने वाले मरीजों की संख्या घटाने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने निर्देश दिया कि गंभीर बीमारियों का इलाज झारखंड में ही सुनिश्चित करने के लिए जरूरी ढांचे, संसाधनों और विशेषज्ञ सुविधाओं को सुदृढ़ किया जाए। इसके लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने पर भी विचार किया जा रहा है।
स्वास्थ्य विभाग ने मुख्यमंत्री गंभीर बीमारी उपचार योजना के अंतर्गत एक विशेष पैकेज भी तय किया है, ताकि जटिल और महंगे उपचार राज्य के भीतर ही उपलब्ध कराए जा सकें। बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि आयुष्मान भारत मुख्यमंत्री अबुआ स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के अंतर्गत आने वाले मरीजों का इलाज अनिवार्य रूप से राज्य में ही कराया जाएगा। केवल उन्हीं मामलों में बाहर इलाज की अनुमति होगी, जो इस योजना के दायरे में नहीं आते हैं।