झारखंड में बनने जा रहा पहला डॉल्फिन अभयारण्य, साहिबगंज बनेगा संरक्षण और पर्यटन का नया केंद्र

झारखंड में बनने जा रहा पहला डॉल्फिन अभयारण्य, साहिबगंज बनेगा संरक्षण और पर्यटन का नया केंद्र

झारखंड में बनने जा रहा पहला डॉल्फिन अभयारण्य, साहिबगंज बनेगा संरक्षण और पर्यटन का नया केंद्र
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Apr 25, 2026, 6:32:00 PM

झारखंड जल्द ही जलीय जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है। राज्य में पहली बार डॉल्फिन अभयारण्य स्थापित करने की योजना अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। गंगा नदी के किनारे साहिबगंज जिले के मसकलैया क्षेत्र में लगभग 10 किलोमीटर लंबे हिस्से को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने की प्रक्रिया चल रही है। इस पहल से जहां गांगेय डॉल्फिन की सुरक्षा को मजबूती मिलेगी, वहीं प्रकृति आधारित पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है।

हाल के सर्वेक्षणों में साहिबगंज क्षेत्र में डॉल्फिन के शिशुओं की उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की गई है। विशेषज्ञों ने इनकी आयु लगभग दो से तीन महीने के बीच बताई है, जिससे संकेत मिलता है कि इनका जन्म सर्दियों के दौरान, विशेषकर नवंबर और दिसंबर में हुआ होगा। इस अवलोकन ने पहली बार स्पष्ट रूप से डॉल्फिन के प्रजनन काल और उनकी लगभग 11 महीने की गर्भावधि के बारे में ठोस जानकारी प्रदान की है, जो उनके जीवन चक्र को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

मसकलैया क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने की योजना इसलिए भी अहम है क्योंकि यहां डॉल्फिन की संख्या घनी मानी जाती है। वर्ष 2024 के आंकड़ों के अनुसार, इस इलाके में 256 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं, जो देश के प्रमुख आवास क्षेत्रों में से एक है। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए यहां एक नेचर इंटरप्रिटेशन सेंटर भी विकसित किया गया है, जिससे इको-टूरिज्म को नई गति मिलने की उम्मीद है।

इस बीच, केंद्र सरकार ने 2025-26 के लिए डॉल्फिन की राष्ट्रीय स्तर पर गणना दोबारा शुरू की है। विशेषज्ञों की टीमें उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में सर्वेक्षण पूरा कर चुकी हैं और अब पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ रही हैं। इससे पहले 2022-23 की गणना में देशभर में कुल 6327 गांगेय डॉल्फिन दर्ज की गई थीं।

गौरतलब है कि गांगेय डॉल्फिन एक विशिष्ट स्तनधारी प्रजाति है, जो देखने में सक्षम नहीं होती और अपने शिकार के लिए ध्वनि तरंगों का सहारा लेती है। इसकी विशिष्टता और संरक्षण की आवश्यकता को देखते हुए भारत सरकार ने इसे वर्ष 2009 में राष्ट्रीय जलीय जीव का दर्जा दिया था।