24.78 लाख हेक्टेयर परती भूमि, 5.71 लाख हेक्टेयर बंजर...चौंकाने वाली है झारखंड की कृषि रिपोर्ट
24.78 लाख हेक्टेयर परती भूमि, 5.71 लाख हेक्टेयर बंजर...चौंकाने वाली है झारखंड की कृषि रिपोर्ट
झारखंड में कृषि संसाधनों के उपयोग को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य में करीब 24.78 लाख हेक्टेयर भूमि ऐसी है, जिस पर फिलहाल खेती नहीं हो रही है। इनमें बड़ी संख्या ऐसी जमीनों की है, जिन्हें किसान अस्थायी रूप से खाली छोड़ते हैं, जबकि लाखों हेक्टेयर भूमि लंबे समय से खेती से बाहर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन क्षेत्रों का वैज्ञानिक ढंग से विकास किया जाए तो कृषि उत्पादन और किसानों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है।
आंकड़ों के अनुसार, राज्य की कुल परती भूमि 24,78,342 हेक्टेयर है। इसमें 14,40,118 हेक्टेयर क्षेत्र चालू परती के रूप में दर्ज है, जिसे किसान एक फसल चक्र के लिए खाली रखते हैं। वहीं 10,38,224 हेक्टेयर भूमि लंबे समय से बिना खेती के पड़ी हुई है।
जिलावार स्थिति पर नजर डालें तो रांची में सबसे अधिक 1,80,975 हेक्टेयर भूमि परती है। इसके बाद पश्चिमी सिंहभूम में 1,71,551 हेक्टेयर, दुमका में 1,59,490 हेक्टेयर और पलामू में 1,27,801 हेक्टेयर भूमि खेती से बाहर है। दूसरी ओर, अपेक्षाकृत छोटे भौगोलिक क्षेत्र वाले रामगढ़ में 50,621 हेक्टेयर तथा सरायकेला-खरसावां में 40,056 हेक्टेयर परती भूमि दर्ज की गई है।]
राज्य में पशुपालन पर भी चारागाह की कमी का असर साफ दिखाई दे रहा है। वर्तमान में केवल 1,13,620 हेक्टेयर क्षेत्र ही स्थायी चरागाह के रूप में उपलब्ध है। इस श्रेणी में दुमका सबसे आगे है, जहां 18,382 हेक्टेयर चारागाह भूमि मौजूद है। इसके बाद जामताड़ा में 14,242 हेक्टेयर और गिरिडीह में 12,897 हेक्टेयर भूमि चराई के लिए उपलब्ध है। इसके विपरीत धनबाद में मात्र 482 हेक्टेयर और लोहरदगा में केवल 58 हेक्टेयर चारागाह बचा है, जिससे पशुधन के लिए चारे की समस्या और गंभीर होती जा रही है।
12.81 लाख हेक्टेयर भूमि खेती के दायरे से बाहर
झारखंड का बड़ा हिस्सा पहाड़ी और पथरीला होने के कारण खेती योग्य नहीं है। साथ ही शहरीकरण, औद्योगिक परियोजनाओं, सड़क और भवन निर्माण ने भी कृषि योग्य क्षेत्र को सीमित किया है। राज्य में कुल 12,81,426 हेक्टेयर भूमि कृषि उपयोग से बाहर है। इसमें 7,09,548 हेक्टेयर भूमि गैर-कृषि गतिविधियों में इस्तेमाल हो रही है, जबकि 5,71,878 हेक्टेयर क्षेत्र शुद्ध बंजर श्रेणी में आता है।
इस श्रेणी में पूर्वी सिंहभूम शीर्ष पर है, जहां 1,85,412 हेक्टेयर भूमि कृषि के लिए उपलब्ध नहीं है। इनमें से 1,38,649 हेक्टेयर क्षेत्र उद्योग, आवास और अन्य गैर-कृषि उपयोग में शामिल है। पश्चिमी सिंहभूम में 1,00,895 हेक्टेयर और धनबाद में 81,151 हेक्टेयर भूमि भी इसी श्रेणी में दर्ज है।
3.49 लाख हेक्टेयर भूमि दोबारा खेती के लायक बनाई जा सकती है
राज्य में 3,49,236 हेक्टेयर ऐसी कृषि योग्य बेकार भूमि भी है, जिसे सिंचाई, उर्वरक और अन्य सुधारात्मक उपायों के जरिए फिर से खेती के योग्य बनाया जा सकता है। इसके अलावा 1,01,985 हेक्टेयर क्षेत्र में बागवानी, पेड़-पौधों और अन्य विविध उपयोग वाली फसलें हैं, जो मुख्य कृषि क्षेत्र में शामिल नहीं हैं।
जिलों की बात करें तो पूर्वी सिंहभूम में 40,184 हेक्टेयर और पश्चिमी सिंहभूम में 37,534 हेक्टेयर कृषि योग्य बेकार भूमि है। वहीं गढ़वा में 9,554 हेक्टेयर और पलामू में 6,124 हेक्टेयर भूमि इस श्रेणी में दर्ज की गई है।
झारखंड का शुद्ध बोया गया क्षेत्र 14,05,985 हेक्टेयर है, लेकिन इनमें से केवल 2,53,417 हेक्टेयर क्षेत्र में ही वर्ष में एक से अधिक फसलें ली जाती हैं। इसका अर्थ है कि राज्य का अधिकांश कृषि क्षेत्र अभी भी मुख्य रूप से एकल फसल, खासकर धान, पर निर्भर है।
कुल फसल क्षेत्र के लिहाज से रांची (1,50,953 हेक्टेयर), पलामू (1,35,084 हेक्टेयर) और पश्चिमी सिंहभूम (1,34,829 हेक्टेयर) प्रमुख जिले हैं। वहीं बहुफसली खेती के मामले में गोड्डा में 42,896 हेक्टेयर और रांची में 28,824 हेक्टेयर क्षेत्र बेहतर स्थिति में है। दूसरी ओर देवघर (1,074 हेक्टेयर) और सिमडेगा (1,278 हेक्टेयर) जैसे जिलों में दोहरी फसल का दायरा अभी भी बेहद सीमित है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परती और कृषि योग्य बेकार भूमि का समुचित विकास किया जाए, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हो और बहुफसली खेती को बढ़ावा मिले, तो झारखंड की कृषि क्षमता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।