अनधिकृत अनुपस्थिति पर झारखंड हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, बर्खास्तगी के नियमों पर दी अहम स्पष्टता

अनधिकृत अनुपस्थिति पर झारखंड हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, बर्खास्तगी के नियमों पर दी अहम स्पष्टता

अनधिकृत अनुपस्थिति पर झारखंड हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, बर्खास्तगी के नियमों पर दी अहम स्पष्टता
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Apr 14, 2026, 12:43:00 PM

झारखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारी अनुशासन और सेवा नियमों की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है, जिसमें कहा गया है कि केवल अनुपस्थिति के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से हटाना उचित नहीं माना जा सकता, जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि उसने जानबूझकर ड्यूटी से दूरी बनाई थी। चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस दीपक रोशन की खंडपीठ ने इस मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए।

यह मामला एक सहायक शिक्षक से जुड़ा था, जो नियुक्ति के कुछ वर्षों बाद गंभीर मानसिक अवसाद से ग्रसित हो गया। इलाज के लिए उसने लंबी छुट्टी ली और इसकी जानकारी विभाग व विद्यालय प्रशासन को पंजीकृत डाक के माध्यम से दी। करीब सात वर्षों तक उपचार कराने के बाद जब चिकित्सकों ने उसे कार्य के लिए फिट घोषित किया, तब उसने दोबारा नौकरी ज्वाइन करने का प्रयास किया, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने उसे सेवा में वापस लेने से इनकार कर दिया।

इस निर्णय के खिलाफ शिक्षक ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जहां पहले एकल पीठ ने बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए खंडपीठ में अपील दायर की।

सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से तर्क दिया गया कि सेवा नियमों के तहत लंबी अनुपस्थिति की स्थिति में सेवा समाप्ति ही एकमात्र विकल्प है। हालांकि, अदालत ने जांच रिपोर्ट और उपलब्ध तथ्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि कर्मचारी की अनुपस्थिति स्वेच्छा से नहीं थी, बल्कि वह गंभीर मानसिक बीमारी के कारण काम से दूर था। जैसे ही उसकी स्थिति में सुधार हुआ, उसने तत्काल सेवा में लौटने की पहल की।

अंततः अदालत ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि चिकित्सकीय कारणों से हुई अनुपस्थिति पर कठोर दंड देना न्यायसंगत नहीं है। खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए सरकार को निर्देश दिया कि मामले पर पुनर्विचार किया जाए और बर्खास्तगी या अनिवार्य सेवानिवृत्ति के बजाय कोई हल्का दंड तय किया जाए।