भरण-पोषण (मेंटेनेंस) को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि CrPC की धारा 125 के तहत दी जाने वाली सहायता का उद्देश्य केवल महिला की न्यूनतम जरूरतें पूरी करना नहीं है। अदालत ने कहा कि इस कानून का असली मकसद विवाहित महिला को आर्थिक संकट और बेघर होने की स्थिति से बचाना है, ताकि वह उसी स्तर का जीवन सम्मानपूर्वक जी सके, जैसा वह पति के साथ रहते हुए जीती थी।
यह टिप्पणी हाईकोर्ट ने रांची फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दाखिल अपीलों पर सुनवाई के दौरान दी। मामले में फैमिली कोर्ट ने पत्नी को 24 हजार रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। दंपति का विवाह 27 जून 1985 को पटना में हुआ था। विवाह के बाद दोनों करीब छह साल तक सऊदी अरब में भी रहे।
पत्नी का आरोप है कि पति का व्यवहार लगातार अपमानजनक रहा और घरेलू विवाद बढ़ने के कारण उसे वर्ष 2006 में ससुराल छोड़ना पड़ा। महिला ने कोर्ट में दावा किया कि पति पटना के एक प्रसिद्ध न्यूरो-फिजिशियन हैं और उनकी मासिक आय तीन लाख रुपये से अधिक है, इसलिए मेंटेनेंस की राशि बढ़ाई जानी चाहिए।
वहीं, पति की ओर से कहा गया कि वह पहले ही पत्नी को 20 लाख रुपये एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता दे चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने दोनों बेटियों की पढ़ाई और बड़ी बेटी की शादी का पूरा खर्च भी उठाया है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में निर्णय आने में हुई लंबी देरी पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि 2015 में दायर याचिका पर 2023 में फैसला आना उचित नहीं माना जा सकता।
सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए 24 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण का निर्देश बरकरार रखा। साथ ही कोर्ट ने मेंटेनेंस राशि बढ़ाने की मांग स्वीकार करने से इनकार कर दिया।