झारखंड मुक्ति मोर्चा ने गुरुवार को दुमका में अपना 47वां स्थापना दिवस मनाया। कार्यक्रम का माहौल भावुक रहा, क्योंकि यह पहली बार था जब पार्टी के संस्थापक और दिशोम गुरु शिबू सोरेन इस आयोजन में मौजूद नहीं थे। समारोह में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शिरकत की और मंच से अपने पिता को याद करते हुए कहा कि आज उनकी कमी गहराई से महसूस हो रही है।
मुख्यमंत्री ने दिशोम गुरु शिबू सोरेन को नमन करते हुए कहा कि झारखंड के लिए उनका संघर्ष, त्याग और आंदोलन ही इस राज्य की असली पहचान है। उन्होंने कहा कि झामुमो की यात्रा आसान नहीं रही, बल्कि यह संघर्षों और बलिदानों से होकर गुज़री है, और यही विरासत पार्टी को आगे बढ़ने की ताकत देती है।
अपने भाषण में हेमंत सोरेन ने हाल ही में किए गए असम दौरे का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन के दौरान झारखंड और ओडिशा के आदिवासियों को जबरन असम के चाय बागानों में ले जाया गया था। आज भी वहां के आदिवासी अपनी पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि एक ही देश में आदिवासियों के साथ अलग-अलग व्यवहार क्यों हो रहा है, जबकि वे इस देश के मूल निवासी हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि असम में आदिवासियों पर सरकारी स्तर पर अत्याचार हो रहे हैं और झारखंड का आदिवासी समाज उनकी इस लड़ाई में पूरी मजबूती से उनके साथ खड़ा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जरूरत पड़ी तो झारखंड के आदिवासी असम जाकर अपना समर्थन भी जताएंगे।
कार्यक्रम के दौरान हेमंत सोरेन ने सरेंगसिया के शहीदों को भी श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि इसी धरती से संघर्ष की शुरुआत हुई और आंदोलन ने सत्ता तक का सफर तय किया। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि आंदोलनकारियों के बलिदान को भुला दिया गया, तो वही समय आगे चलकर सबसे कठिन साबित होगा।
स्थापना दिवस समारोह में राज्य के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक पहुंचे थे। मुख्यमंत्री ने सभी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि झामुमो का गौरवशाली इतिहास ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति और पहचान है।