रांची में रिम्स (डीआईजी ग्राउंड) भूमि विवाद को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव आलोक कुमार दूबे ने इस मुद्दे पर भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी के बयान की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि अतिक्रमण की समस्या कोई नई या हालिया घटना नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में वर्षों से चली आ रही एक जटिल प्रशासनिक और सामाजिक चुनौती रही है।
कांग्रेस महासचिव ने सवाल उठाया कि बाबूलाल मरांडी अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल को लेकर स्पष्टता दें। उन्होंने पूछा कि क्या उस समय झारखंड पूरी तरह अतिक्रमण मुक्त था? दूबे ने कहा कि यदि अतिक्रमण गलत माना जाता है, तो प्रशासन को शुरुआत में ही सख्त कदम उठाने चाहिए थे। लेकिन वास्तविकता यह रही कि जिन गरीब परिवारों ने वहां बसावट की, उन्हें बिजली-पानी की सुविधा दी गई, होल्डिंग टैक्स वसूला गया और आधार कार्ड सहित अन्य सरकारी दस्तावेज भी बनाए गए। इससे यह साफ होता है कि सरकारी तंत्र ने लंबे समय तक उस बसावट को मान्यता दी।
उन्होंने यह भी कहा कि वर्षों से बसे ये लोग शहर की अर्थव्यवस्था और व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। यदि ये लोग अपना कार्य बंद कर दें, तो पूरे शहर की दिनचर्या ठप हो सकती है। ऐसे में 15 से 25 वर्षों से वहां रह रहे परिवारों के घरों को अचानक तोड़ना अमानवीय कदम है।
आलोक कुमार दूबे ने सरकार की नीतियों में विरोधाभास की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि एक ओर गरीबों के लिए आवास योजनाएं चलाई जा रही हैं और सहायता सामग्री वितरित की जा रही है, जबकि दूसरी ओर उन्हीं लोगों के बसे-बसाए घरों को तोड़ा जा रहा है। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया।
कांग्रेस महासचिव ने स्पष्ट किया कि पार्टी न्यायालय के आदेशों का पूरा सम्मान करती है और उन पर कोई प्रश्न नहीं उठाती। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार वह प्रशासनिक व्यवस्था है, जिसने समय रहते कार्रवाई नहीं की और गरीब परिवारों को भ्रम की स्थिति में रहने दिया।
भाजपा पर निशाना साधते हुए दूबे ने आरोप लगाया कि बाबूलाल मरांडी इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि वास्तव में गरीबों की चिंता होती, तो भाजपा को अपने शासनकाल के दौरान पनपे ऐसे मामलों पर आत्ममंथन करना चाहिए था।
अंत में उन्होंने प्रशासन से मांग की कि किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ से पहले प्रभावित गरीब परिवारों के लिए वैकल्पिक पुनर्वास की व्यवस्था की जाए और इस पूरे मामले में प्रशासनिक लापरवाही तय की जाए। उनका कहना था कि गरीबों को दंडित करना समाधान नहीं है, बल्कि जवाबदेही तय करना ही स्थायी रास्ता है।