लोकतंत्र की चौथी स्तंभ पर चोट! रांची में पत्रकारों पर हमला, कटघरे में कानून-व्यवस्था

लोकतंत्र की चौथी स्तंभ पर चोट! रांची में पत्रकारों पर हमला, कटघरे में कानून-व्यवस्था

लोकतंत्र की चौथी स्तंभ पर चोट! रांची में पत्रकारों पर हमला, कटघरे में कानून-व्यवस्था
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Jan 07, 2026, 11:10:00 AM

राजधानी रांची में लगातार सामने आ रही हिंसक घटनाओं ने शहर की कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता गहरा दी है। हालात ऐसे प्रतीत हो रहे हैं मानो अपराधियों के मन से न कानून का भय बचा है और न ही पुलिस-प्रशासन का खौफ। बीते कुछ दिनों में हुई घटनाएं इस ओर इशारा कर रही हैं कि अपराधियों का दुस्साहस तेजी से बढ़ा है और आम नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

हाल ही में लालपुर इलाके में एक युवक की बेरहमी से पिटाई कर हत्या कर दी गई। इससे पहले 31 दिसंबर की रात बिरसा चौक पर एक युवक को वाहन से कुचलकर जान से मार दिया गया था। अब ताजा मामला मीडियाकर्मियों पर हुए जानलेवा हमले से जुड़ा है, जिसने सुरक्षा व्यवस्था पर और बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार, 6 जनवरी की रात लगभग एक बजे दो मीडियाकर्मी कार्यालय का काम निपटाकर अपने घर लौट रहे थे। कोकर स्थित सुभाष चौक के पास पहुंचते ही बाइक सवार दो युवकों ने उनसे छिनतई की कोशिश करते हुए अचानक हमला कर दिया। हमले की खबर फैलते ही आसपास कुछ देर के लिए अफरातफरी का माहौल बन गया।

इस घटना में राहत की बात यह रही कि आसपास मौजूद स्थानीय ग्रामीणों ने तत्परता और साहस का परिचय दिया। उन्होंने आरोपियों का पीछा कर उन्हें पकड़ लिया और किसी प्रकार की हिंसा किए बिना दोनों को पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस ने भी तत्काल संज्ञान लेते हुए आरोपियों के खिलाफ नियमानुसार लिखित कार्रवाई शुरू कर दी है।

हालांकि इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या हर बार अपराधियों को पकड़ने की जिम्मेदारी आम लोगों को ही उठानी पड़ेगी? यदि समय रहते ग्रामीण मदद के लिए आगे नहीं आते, तो क्या किसी गंभीर अनहोनी की आशंका से इनकार किया जा सकता था?

आज स्थिति यह है कि राजधानी में न दिन पूरी तरह सुरक्षित रह गया है और न ही रात। प्रमुख चौक-चौराहों और व्यस्त सड़कों पर भी अपराधियों की बेखौफ गतिविधियां नजर आ रही हैं। जब मीडियाकर्मी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता की सुरक्षा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं। अगर हालात पर सख्ती से काबू नहीं पाया गया, तो जनता के सवाल और भी तीखे होंगे। लोग जानना चाहते हैं कि क्या वाकई राजधानी में कानून का राज कमजोर पड़ चुका है, या फिर अपराधियों के हौसले बुलंद होने के पीछे कोई और वजह है।