77 करोड़ के बैंक बकाया पर हाईकोर्ट सख्त, कानूनी दांव-पेच पर लगाई रोक

77 करोड़ के बैंक बकाया पर हाईकोर्ट सख्त, कानूनी दांव-पेच पर लगाई रोक

77 करोड़ के बैंक बकाया पर हाईकोर्ट सख्त, कानूनी दांव-पेच पर लगाई रोक
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Jun 27, 2026, 1:05:00 PM

देवघर स्थित मां ललिता हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर से जुड़े बहुचर्चित बैंक ऋण विवाद में झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए सार्वजनिक धन की वसूली को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि बैंक के बकाया ऋण की वसूली में बाधा डालने के उद्देश्य से कानूनी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं है। साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि डेट रिकवरी अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) के चेयरपर्सन अपने प्रशासनिक अधिकारों के आधार पर न्यायिक प्रकृति के आदेश पारित नहीं कर सकते।

न्यायमूर्ति आनंद सेन की एकल पीठ ने 10 और 21 अप्रैल 2026 को डीआरएटी, इलाहाबाद द्वारा पारित उन अंतरिम आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके कारण नीलामी में खरीदी गई संपत्ति के पक्ष में सेल सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया रोक दी गई थी। अदालत के फैसले के बाद अब संबंधित बैंक नीलामी खरीदार के नाम सेल सर्टिफिकेट जारी करने के लिए स्वतंत्र होगा।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि ऋण लेने वाले पक्ष ने पहले बैंक के साथ समझौता कर संपत्ति का कब्जा वापस हासिल किया, लेकिन समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया। इसके बाद विभिन्न न्यायिक मंचों पर लगातार याचिकाएं दायर कर वसूली प्रक्रिया को लंबा खींचने का प्रयास किया गया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि 77 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी होने के बावजूद याचिकाकर्ता अदालत के निर्देशानुसार 2 करोड़ रुपये तक जमा नहीं कर सका, जिससे उसकी नीयत पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। न्यायालय ने दोहराया कि बैंक का बकाया सार्वजनिक धन है और उसकी वसूली कानून के अनुरूप समय पर होना आवश्यक है।

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने रिकवरी ऑफ डेट्स एंड बैंकरप्सी एक्ट की धारा 17A की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रावधान चेयरपर्सन को केवल प्रशासनिक और पर्यवेक्षण संबंधी अधिकार देता है। किसी लंबित न्यायिक विवाद में अंतरिम राहत देना या रोक संबंधी आदेश पारित करना उनके अधिकार क्षेत्र में शामिल नहीं है। अदालत के अनुसार, सेल सर्टिफिकेट जारी करने पर रोक लगाने का आदेश न्यायिक प्रकृति का था, इसलिए उसे धारा 17A के तहत पारित नहीं किया जा सकता था। इस आधार पर डीआरएटी का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर माना गया।

क्या है पूरा मामला

मामले के अनुसार, इंडियन बैंक (पूर्व में इलाहाबाद बैंक) ने मां ललिता हॉस्पिटल परियोजना के लिए अलग-अलग चरणों में पहले 2 करोड़ रुपये, फिर 9 करोड़ रुपये और बाद में कुल मिलाकर 19.45 करोड़ रुपये का ऋण स्वीकृत किया था। ऋण खाते के गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) बनने के बाद बैंक ने SARFAESI Act के तहत वसूली की कार्रवाई शुरू की। बीच में समझौता होने के बावजूद उधारकर्ता ने उसकी शर्तों का पालन नहीं किया। इसके बाद बैंक ने लगभग 70.92 करोड़ रुपये की बकाया राशि की वसूली के लिए संपत्ति की नीलामी कराई, जिसमें 44.22 करोड़ रुपये की सर्वोच्च बोली प्राप्त हुई।

अदालत ने बैंक और नीलामी खरीदार की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए डीआरएटी के दोनों अंतरिम आदेशों को निरस्त कर दिया। फैसले में स्पष्ट किया गया कि अब नीलामी खरीदार के पक्ष में सेल सर्टिफिकेट जारी करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं रह गई है और बैंक आगे की प्रक्रिया पूरी कर सकता है।