30 साल पुराने ह*त्या मामले में झारखंड HC का बड़ा फैसला, जानें

30 साल पुराने ह*त्या मामले में झारखंड HC का बड़ा फैसला, जानें

30 साल पुराने ह*त्या मामले में झारखंड HC का बड़ा फैसला, जानें
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Jun 26, 2026, 10:52:00 AM

झारखंड हाईकोर्ट ने लगभग तीन दशक पुराने हत्या प्रकरण में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए मनसु मांझी उर्फ मानसा मांझी को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को केवल संदेह या असंगत गवाहियों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय ने यह भी दोहराया कि यदि उपलब्ध साक्ष्यों से दो अलग-अलग निष्कर्ष निकलते हों, तो कानून के अनुसार वह निष्कर्ष स्वीकार किया जाना चाहिए जो आरोपी के पक्ष में जाता हो।

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने बोकारो की प्रथम अतिरिक्त सत्र अदालत द्वारा वर्ष 1999 में सुनाए गए दोषसिद्धि के फैसले और वर्ष 2000 में दी गई आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 1996 में दर्ज हुआ था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मनसु मांझी और एक अन्य व्यक्ति ने चंद्रमणि मांझियान की हत्या इस अंधविश्वास के कारण कर दी थी कि वह 'डायन' थी। ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

अपील की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन का पूरा मामला मुख्य रूप से एक कथित प्रत्यक्षदर्शी, रूपलाल मांझी, की गवाही पर आधारित था। हालांकि, उसकी गवाही में कई महत्वपूर्ण विसंगतियां सामने आईं। अदालत ने कहा कि उसकी पत्नी का बयान भी उसके कथनों का समर्थन नहीं करता और घटना देखने के उसके दावे पर भी गंभीर संदेह उत्पन्न होता है।

इसके अलावा, गवाह ने अलग-अलग मौकों पर हत्या में प्रयुक्त हथियार को लेकर विरोधाभासी बयान दिए। कहीं उसने कुल्हाड़ी का उल्लेख किया तो कहीं तलवार का। न्यायालय ने माना कि इस तरह की असंगतियां अभियोजन की कहानी को कमजोर करती हैं।

खंडपीठ ने यह भी रेखांकित किया कि मामले के जांच अधिकारी को अदालत में पेश नहीं किया गया। इससे घटनास्थल और जांच की प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों की पुष्टि नहीं हो सकी। न्यायालय के अनुसार, इस कमी से आरोपी के बचाव के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

'संदेह से परे' सिद्ध होना चाहिए अपराध : HC

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि तभी संभव है जब आरोप पूरी तरह विश्वसनीय और संदेह से परे साबित किए जाएं। यदि साक्ष्यों में ऐसी कमियां हों जिनसे आरोपी की संलिप्तता पर उचित संदेह बना रहे, तो उसका लाभ आरोपी को मिलना चाहिए।

उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद हाईकोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अभियोजन पक्ष हत्या का आरोप प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि और सजा संबंधी आदेश रद्द करते हुए मनसु मांझी को बरी कर दिया गया। चूंकि वह पहले से जमानत पर था, इसलिए अदालत ने उसे जमानत बंधपत्रों की शर्तों से भी मुक्त कर दिया।