डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (डीएसपीएमयू) ने शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक स्थिर और प्रभावी बनाने के लिए दो महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लागू किए हैं। इन फैसलों के तहत बीएड पाठ्यक्रम से जुड़े संविदा शिक्षकों पर वर्षों से लागू सेवा ब्रेक की प्रक्रिया समाप्त कर दी गई है, वहीं विभागों का नेतृत्व संभाल रहे प्रभारी (एक्टिंग) एचओडी को भी अब नियमित विभागाध्यक्षों के समान अधिकार और सुविधाएं दी जाएंगी।
विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से भेजे गए प्रस्तावों को राज्यपाल सह कुलाधिपति संतोष कुमार गंगवार की स्वीकृति मिल चुकी है। इसके बाद दोनों निर्णयों से संबंधित आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी गई है। प्रशासन का कहना है कि इन बदलावों से शिक्षकों को कार्य में सुरक्षा और स्थायित्व मिलेगा, जिससे पढ़ाई की निरंतरता बनी रहेगी और प्रशासनिक कामकाज भी सुचारु होगा।
अब तक बीएड कोर्स में कार्यरत संविदा शिक्षकों को हर शैक्षणिक सत्र के अंत में औपचारिक रूप से सेवा मुक्त कर दिया जाता था और फिर नए सत्र में उनकी पुनः नियुक्ति की जाती थी। इस व्यवस्था के कारण शिक्षकों में अनिश्चितता बनी रहती थी और इसका असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर भी पड़ता था। साथ ही यह प्रक्रिया राष्ट्रीय अध्यापन प्रशिक्षण परिषद (एनसीटीई) की गाइडलाइन के अनुरूप भी नहीं थी। नए फैसले के बाद बीएड के संविदा शिक्षक सहायक प्रोफेसर के पद पर अन्य शिक्षकों की तरह 65 वर्ष की आयु तक सेवाएं दे सकेंगे।
दूसरे अहम निर्णय के तहत विश्वविद्यालय ने प्रभारी विभागाध्यक्षों को भी नियमित एचओडी के समान सुविधाएं देने का प्रावधान किया है। अब उन्हें भी प्रति वर्ष 33 दिनों का अर्जित अवकाश मिलेगा। हालांकि, ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान विश्वविद्यालय हित में आवश्यक होने पर उन्हें मुख्यालय में उपलब्ध रहना होगा। शैक्षणिक या प्रशासनिक जरूरत पड़ने पर अवकाश अवधि में भी विभागाध्यक्षों की सेवाएं ली जा सकेंगी।
डीएसपीएमयू के इन निर्णयों का असर झारखंड के अन्य विश्वविद्यालयों पर भी पड़ने की संभावना जताई जा रही है। फिलहाल रांची विश्वविद्यालय सहित राज्य के कई संस्थानों में बीएड शिक्षकों को सेवा ब्रेक का सामना करना पड़ता है और बड़ी संख्या में विभाग प्रभारी एचओडी के भरोसे संचालित हो रहे हैं। ऐसे में राज्यपाल की मंजूरी के बाद डीएसपीएमयू में लागू यह मॉडल अन्य विश्वविद्यालयों के लिए भी मिसाल बन सकता है।