झारखंड के गुमला जिले से वर्ष 2018 में लापता हुई एक बच्ची के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस की जांच प्रक्रिया पर कड़ा रुख अपनाया है। लंबे समय बीत जाने के बावजूद बच्ची का पता नहीं चल पाने पर अदालत ने मामले की जांच में हुई देरी और लापरवाही को लेकर तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने इस दौरान वर्ष 2018 से अब तक गुमला में पदस्थापित रहे पुलिस अधीक्षकों और जांच अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को जानकारी दी कि बच्ची अब तक बरामद नहीं हो सकी है। सरकार की ओर से बताया गया कि हाल ही में गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने कई राज्यों में तलाश अभियान चलाया। टीमों ने मुंबई, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और जम्मू सहित विभिन्न स्थानों पर जांच की, लेकिन बच्ची के बारे में कोई निर्णायक जानकारी हाथ नहीं लगी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने केस डायरी का अवलोकन करते हुए जांच की गति और दिशा पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि मामले के मुख्य संदिग्ध का बयान अब तक दर्ज क्यों नहीं किया गया। इस पर पुलिस अधिकारियों ने जवाब दिया कि आरोपी के घर पहुंचने पर हर बार उसकी तबीयत खराब होने की बात कही जाती रही, जिसके कारण बयान नहीं लिया जा सका।
अदालत ने यह भी जानना चाहा कि जब वर्ष 2020 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी, तब तत्काल प्रभाव से कार्रवाई क्यों नहीं हुई। पीड़िता की मां द्वारा जिन लोगों पर संदेह जताया गया था, उनसे समय रहते पूछताछ क्यों नहीं की गई, इस पर भी कोर्ट ने नाराजगी जताई। न्यायालय ने टिप्पणी की कि सात वर्षों तक किसी बच्ची का कोई सुराग न मिलना कानून-व्यवस्था और जांच तंत्र दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
कोर्ट ने पुलिस व्यवस्था पर व्यापक टिप्पणी करते हुए कहा कि आम नागरिकों को कई बार थाने में शिकायत दर्ज कराने तक में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में शुरुआती स्तर पर सक्रियता दिखाई जाती तो संभवतः जांच की दिशा अलग हो सकती थी।
यह मामला गुमला जिले की उस छह वर्षीय बच्ची से जुड़ा है, जो सितंबर 2018 में अचानक लापता हो गई थी। बच्ची की मां ने बेटी की बरामदगी की मांग को लेकर हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की है। इससे पहले भी अदालत राज्य सरकार से मामले में प्रगति रिपोर्ट मांग चुकी है और जांच तेज करने के निर्देश दे चुकी है।
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि एसआईटी ने बच्ची की तस्वीरें विभिन्न माध्यमों से साझा कर खोज अभियान को व्यापक बनाने की कोशिश की। जांच के दौरान कुछ अन्य लापता बच्चों को बरामद करने में सफलता भी मिली, लेकिन संबंधित बच्ची का अब तक कोई पता नहीं चल पाया है।
मामले की अगली सुनवाई को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद पुलिस प्रशासन पर जांच को लेकर दबाव बढ़ गया है, जबकि बच्ची का परिवार अब भी उसकी सुरक्षित वापसी की उम्मीद लगाए हुए है।