झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले स्थित सारंडा के घने जंगलों में सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच निर्णायक टकराव की स्थिति बन गई है। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, करीब 50 से अधिक उग्रवादी, जिनमें दो बड़े इनामी कमांडर भी शामिल हैं, एक सीमित इलाके में घिर चुके हैं। बाहर निकलने की उनकी हर कोशिश सुरक्षा बलों की सख्त तैनाती के कारण नाकाम हो रही है।
हालिया मुठभेड़ में एरिया कमांडर इसराइल पूर्ति के मारे जाने के बाद नक्सलियों की स्थिति और कमजोर हुई है। स्थानीय भूगोल की गहरी समझ रखने वाला यह कमांडर संगठन के लिए अहम कड़ी था। उसकी मौत के बाद जंगल में छिपे उग्रवादियों की दिशा और रणनीति दोनों प्रभावित हुई हैं, जिससे वे असमंजस की स्थिति में हैं।
सुरक्षाबलों ने पूरे इलाके को चारों ओर से घेर रखा है। नक्सलियों ने बचाव के तौर पर सैकड़ों आईईडी लगाकर रास्तों को खतरनाक बना दिया है। बम निरोधक दस्ते लगातार इन विस्फोटकों को निष्क्रिय करने में जुटे हैं, ताकि अभियान को आगे बढ़ाया जा सके।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि संगठन को स्थानीय कैडरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। दबाव बढ़ने के चलते कई स्थानीय सदस्य पहले ही भाग चुके हैं। वर्तमान में जो उग्रवादी सक्रिय हैं, उनमें बड़ी संख्या अन्य राज्यों, जैसे पश्चिम बंगाल, बिहार और छत्तीसगढ़ से आए लोगों की है, जिन्हें इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों की सीमित जानकारी है।
इस पूरे ऑपरेशन में कुछ प्रमुख नक्सली नेताओं की मौजूदगी भी बताई जा रही है। इनमें झारखंड में सक्रिय इनामी कमांडर मिसिर बेसरा, पश्चिम बंगाल के असीम मंडल और तकनीकी विशेषज्ञ संतोष उर्फ टेक विश्वनाथ शामिल हैं। इनकी सुरक्षा में छत्तीसगढ़ से जुड़े उग्रवादी भी तैनात बताए जाते हैं।
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि मौजूदा हालात में नक्सलियों के लिए जंगल से सुरक्षित निकलना बेहद कठिन हो गया है। रसद की कमी, स्थानीय सहयोग का अभाव और मार्गदर्शन की दिक्कतें उनकी परेशानी बढ़ा रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि जैसे-जैसे आईईडी हटाए जाएंगे, उग्रवादियों के पास आत्मसमर्पण या मुठभेड़ के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
चाईबासा क्षेत्र में चल रहा यह अभियान अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है। अतिरिक्त बलों की तैनाती की गई है और ऑपरेशन को और तेज कर दिया गया है। सुरक्षाबलों के वरिष्ठ अधिकारियों ने संकेत दिया है कि इस क्षेत्र में नक्सल गतिविधियों को निर्णायक झटका देने की स्थिति बन चुकी है।
भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण यह इलाका छोटानागरा और जराइकेला थाना क्षेत्रों के अंतर्गत आता है, जहां ऊंचे पहाड़ और घने जंगल अभियान को कठिन बनाते हैं। पिछले दिनों हुए विस्फोटों में कई सुरक्षाकर्मी घायल हुए हैं, जबकि एक जंगली हाथी भी इसकी चपेट में आ चुका है।
सुरक्षा बलों की रणनीति स्पष्ट है; घेराबंदी को बनाए रखते हुए धीरे-धीरे इलाके को सुरक्षित करना और उग्रवादियों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना। अधिकारियों का मानना है कि सारंडा में नक्सल नेटवर्क का भविष्य अब निर्णायक मोड़ पर है।