कोयले के प्रभावी और पर्यावरण-अनुकूल उपयोग के लिए उसकी वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेसिंग अनिवार्य है। CSIR-सिंफर के निदेशक प्रो. अरविंद कुमार मिश्रा ने कहा कि कोयले की धुलाई से उसमें मौजूद राख की मात्रा कम की जा सकती है, जिससे न केवल इसकी गुणवत्ता बेहतर होती है बल्कि प्रदूषण नियंत्रण में भी मदद मिलती है। उन्होंने खनन क्षेत्र में आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए इसे सुरक्षा और दक्षता दोनों के लिए महत्वपूर्ण बताया।
यह बातें उन्होंने सोमवार को सिंफर के डिगवाडीह स्थित परिसर में आयोजित ‘कोयला धुलाई योग्यता अध्ययन’ विषयक कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में कहीं। इस अवसर पर पांच दिवसीय कार्यकारी विकास कार्यक्रम (EDP) की शुरुआत भी की गई, जिसमें विभिन्न तकनीकी पहलुओं पर चर्चा की जा रही है।
कार्यक्रम के तहत Singareni Collieries Company Limited (SCCL) के अधिकारियों को कोयला धुलाई और खनिज प्रसंस्करण से संबंधित उन्नत तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रो. मिश्रा ने बताया कि स्वतंत्रता के बाद से संस्थान के वैज्ञानिकों ने निरंतर अनुसंधान के माध्यम से देश में उपलब्ध कोयले को कोक में बदलने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। इससे आयातित कोयले पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिली है।
उद्घाटन सत्र में कई वरिष्ठ वैज्ञानिक और अधिकारी उपस्थित रहे। इनमें वैज्ञानिक प्रभारी पिनाकी, वरिष्ठ वैज्ञानिक पीके बनर्जी, कोयला एवं खनिज प्रसंस्करण समूह के प्रमुख मनीष कुमार, एचआरडी समन्वयक अमरनाथ, एचआरडी प्रमुख दिलीप कुंभकार और वैज्ञानिक केएमपी सिंह शामिल थे। इसके अलावा SCCL के प्रतिनिधि और अन्य अतिथि भी कार्यक्रम में मौजूद रहे।
इस दौरान डॉ. मनीष कुमार ने प्रशिक्षण कार्यक्रम की विस्तृत योजना साझा की, जबकि एचआरडी समन्वयक अमरनाथ ने संस्थान द्वारा हाल के दिनों में आयोजित विभिन्न प्रशिक्षण पहलों की जानकारी दी। कार्यक्रम के जरिए कोयला क्षेत्र में तकनीकी दक्षता बढ़ाने और पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने की दिशा में प्रयासों को गति देने पर जोर दिया गया।