मखाना खेती में क्रांति, बीएयू वैज्ञानिकों ने बनाई मखाना हार्वेस्टर मशीन, घंटों का काम अब मिनटों में
भागलपुर जिले के सबौर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने मखाना उत्पादन के क्षेत्र में एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि हासिल की है।

भागलपुर जिले के सबौर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने मखाना उत्पादन के क्षेत्र में एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने सबौर मखाना हार्वेस्टर मशीन विकसित की है, जो कम समय, कम लागत और सुरक्षित तरीके से मखाना बीज की हार्वेस्टिंग करने में सक्षम है। इस मशीन से राज्य के करीब पांच लाख मखाना किसानों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
अब तक मखाना की कटाई पूरी तरह पारंपरिक और बेहद बोझिल प्रक्रिया रही है। किसानों और मजदूरों को तालाबों के गहरे पानी और कीचड़ में उतरकर दिन-दिन भर कठिन परिश्रम करना पड़ता था। इससे न केवल समय और लागत ज्यादा लगती थी, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी बने रहते थे। पारंपरिक विधि से एक एकड़ क्षेत्र में मखाना बीज निकालने में तीन चरणों में 18 से 20 दिन का समय लगता था। इस दौरान 20 से 21 मजदूरों की जरूरत पड़ती थी और खर्च 28 से 30 हजार रुपये तक पहुंच जाता था, जबकि औसत उपज केवल 6 से 7 क्विंटल रहती थी।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नई मखाना हार्वेस्टर मशीन ने इस पूरी प्रक्रिया को आसान बना दिया है। इस मशीन की मदद से मात्र 1 से 5 दिनों में एक एकड़ क्षेत्र से 6 से 7 क्विंटल मखाना बीज निकाला जा सकता है। इसके लिए केवल 7 से 10 मजदूरों की आवश्यकता होती है और कुल लागत घटकर 10 से 12 हजार रुपये रह जाती है। मशीन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 5 से 6 घंटे में 60 से 70 प्रतिशत तक मखाना बीज निकालने में सक्षम है।
इस अत्याधुनिक मशीन का 10 जनवरी को बीएयू सबौर के अधीन संचालित पूर्णिया स्थित भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय में तालाब में प्रत्यक्ष प्रदर्शन किया गया।
कार्यक्रम में बिहार सरकार के कृषि विभाग के प्रधान सचिव नर्मदेश्वर लाल और बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह विशेष रूप से उपस्थित रहे। विज्ञानियों ने मशीन की कार्यक्षमता का जीवंत प्रदर्शन करते हुए इसके तकनीकी और आर्थिक लाभों की जानकारी दी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मशीन न केवल किसानों और मजदूरों को तालाब और कीचड़ में उतरने की मजबूरी से मुक्त करेगी, बल्कि बिहार को मखाना उत्पादन के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में और मजबूत पहचान दिलाने में भी अहम भूमिका निभाएगी। यह नवाचार मखाना किसानों के लिए तकनीक आधारित खेती की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।













