प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना इस समय कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। फरवरी 2024 में शुरू की गई इस योजना का लक्ष्य था कि मार्च 2025 तक देशभर में 40 लाख आवासीय छतों पर सोलर पैनल लगाए जाएं। सरकार ने लागत का 40 प्रतिशत तक सब्सिडी देने का प्रावधान रखा, ताकि आम लोग आसानी से सौर ऊर्जा अपना सकें। लेकिन जमीनी हकीकत इस लक्ष्य से काफी पीछे दिखाई दे रही है।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अब तक केवल 23.6 लाख घरों में ही सोलर इंस्टॉलेशन हो पाया है। यानी तय लक्ष्य का लगभग आधा ही पूरा हो सका है। योजना पोर्टल पर आए आवेदनों की स्थिति भी चिंताजनक है—करीब 60 प्रतिशत आवेदन अब तक मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं, जबकि लगभग 7 प्रतिशत आवेदन सीधे खारिज कर दिए गए हैं।
ऊर्जा क्षेत्र की विशेषज्ञ श्रेया जय का मानना है कि बैंकों की अनिच्छा और राज्यों की उदासीनता भारत के स्वच्छ ऊर्जा मिशन को पटरी से उतार सकती है। दरअसल, योजना की सबसे बड़ी बाधा बैंकिंग सेक्टर में दिखाई दे रही है। बैंक सार्वजनिक धन की सुरक्षा का हवाला देते हुए दस्तावेजों की कड़ी जांच कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि कोई ऋण डूब जाता है तो सोलर पैनल को जब्त कर लेने से उन्हें वास्तविक आर्थिक सुरक्षा नहीं मिलती।
वहीं दूसरी ओर, राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्यों में वेंडरों और एसोसिएशन ने बैंकों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि दो लाख रुपये से कम के ऋण के लिए भी कोलैटरल मांगा जा रहा है, जबकि योजना के दिशा-निर्देशों में इसकी आवश्यकता नहीं है। कई जगहों पर बिजली बिल का पुराना बकाया या जमीन के कागजात पूर्वजों के नाम पर होने जैसे कारणों से आवेदन रद्द किए जा रहे हैं।
योजना की धीमी रफ्तार का एक और बड़ा कारण राज्य बिजली वितरण कंपनियों यानी डिस्कॉम्स का रवैया है। जब अपेक्षाकृत संपन्न परिवार ग्रिड बिजली छोड़कर सौर ऊर्जा अपनाते हैं, तो डिस्कॉम्स को उच्च टैरिफ वाले उपभोक्ताओं से मिलने वाला राजस्व कम हो जाता है। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि इससे डिस्कॉम्स पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है।
यह स्थिति भारत के 2030 तक 500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लक्ष्य के लिए चुनौती बन सकती है। यदि बैंकिंग प्रक्रियाएं सरल नहीं हुईं और राज्यों का सहयोग नहीं बढ़ा, तो देश की कोयले पर निर्भरता कम करने की राह और कठिन हो सकती है।