मोक्ष नगरी राजगीर में आध्यात्मिक उत्सव का आगाज, 15 जून तक चलेगा मलमास मेला

मोक्ष नगरी राजगीर में आध्यात्मिक उत्सव का आगाज, 15 जून तक चलेगा मलमास मेला

मोक्ष नगरी राजगीर में आध्यात्मिक उत्सव का आगाज, 15 जून तक चलेगा मलमास मेला
swaraj post

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: May 17, 2026, 1:49:00 PM

बिहार के प्राचीन धार्मिक नगर राजगीर में विश्वप्रसिद्ध मलमास मेले का शुभारंभ हो गया। एक महीने तक चलने वाला यह आध्यात्मिक आयोजन 17 मई से 15 जून तक चलेगा, जिसमें देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। मेले का उद्घाटन सम्राट चौधरी ने किया। इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार तथा जदयू सांसद कौशलेंद्र कुमार भी मौजूद रहे।

उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि मलमास मेला भारतीय सनातन परंपरा की आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक है। उनके अनुसार यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और लोकआस्था का जीवंत उत्सव है, जहां श्रद्धालु आत्मिक शांति और पुण्य की प्राप्ति के लिए पहुंचते हैं। उन्होंने राज्य की सुख-समृद्धि और सामाजिक कल्याण की कामना भी की।

राजगीर में आयोजित होने वाले इस मेले को लेकर अनेक धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि अधिक मास के दौरान 33 करोड़ देवी-देवता पृथ्वी पर आकर राजगीर के गर्म जलकुंडों में निवास करते हैं। इसी कारण इस अवधि को अत्यंत पवित्र माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सतयुग में ब्रह्मा के प्रपौत्र राजा बसु ने यहां विशाल वाजपेयी यज्ञ कराया था, जिसमें देवताओं को आमंत्रित किया गया था। मान्यता है कि भगवान विष्णु को इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनाया गया, जिसके कारण इसे ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाने लगा।

तीर्थराज छठ पंडा समिति से जुड़े सुधीर उपाध्याय के अनुसार अधिक मास की अवधारणा भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार से भी जुड़ी हुई है। कथा के मुताबिक दैत्यराज हिरण्यकश्यप को ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु न दिन में होगी, न रात में, न घर के भीतर, न बाहर और न ही वर्ष के किसी निर्धारित महीने में। तब भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर संध्या बेला में चौखट पर उसका अंत किया और इसी क्रम में 13वें महीने यानी अधिक मास की उत्पत्ति मानी जाती है।

मलमास मेले की सबसे चर्चित और रहस्यमयी मान्यता कौवों से जुड़ी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मेले के दौरान पूरे क्षेत्र में कौवे दिखाई नहीं देते। इसके पीछे यह कथा प्रचलित है कि राजा बसु के यज्ञ में कागभुशुण्डि को निमंत्रण नहीं दिया गया था। इससे नाराज होकर काग देवता ने इस अवधि में राजगीर से दूर रहने का निर्णय लिया। श्रद्धालु इसे आज भी चमत्कारिक परंपरा के रूप में देखते हैं।

यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय आस्था का केंद्र भी बन चुका है। नेपाल, मॉरीशस समेत कई देशों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और राजगीर के 22 पवित्र गर्म जलकुंडों में स्नान करते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार श्रद्धालु स्नान के बाद वैतरणी नदी पहुंचते हैं, जहां गाय की पूंछ पकड़कर प्रतीकात्मक रूप से वैतरणी पार करने की रस्म निभाई जाती है। मान्यता है कि इससे मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। वैतरणी तट पर विराजमान साक्षी गोपाल को इस धार्मिक कर्म का साक्षी माना जाता है।