राज्य सरकार के प्रयास से बिहार में रसायन मुक्त खेती को निरंतर गति मिल रही है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में सरकार नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग के तहत 5700 हेक्टेयर में प्राकृतिक खेती कराने जा रही है। इस पद्धति में किसान रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बजाय गोबर, गोमूत्र और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हैं। इससे खेती की लागत कम होती है, जमीन की उर्वरता बनी रहती है और उपज भी स्वास्थ्यवर्धक होती है।
योजना के तहत प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को अधिकतम एक एकड़ तक 4000 रुपए प्रति एकड़ की दर से अनुदान दिया जाएगा। किसानों को तकनीकी सहायता देने के लिए 800 कृषि सखियों का चयन किया गया है, जिन्हें 5000 रुपए प्रति माह मानदेय दिया जाएगा। सरकार के इन प्रयासों का नतीजा है कि राज्य के किसान अब तेजी से रसायन मुक्त खेती को अपना रहे हैं। वहीं, किसानों को जैविक आदान आसानी से उपलब्ध कराने के लिए हर 3 क्लस्टर पर 2 बायो रिसोर्स सेंटर (बीआरसी) स्थापित किए जाएंगे। इसके अलावा बिहार राज्य जैविक मिशन के रसायन मुक्त खेती को गति मिल रही है।
इस योजना के तहत पक्का वर्मी कम्पोस्ट पीट इकाई, गोबर गैस इकाई और व्यावसायिक वर्मी कम्पोस्ट इकाई की स्थापना पर भी लाभुकों को भारी अनुदान दिया जाता है। परम्परागत कृषि विकास योजना के तहत भी रसायन मुक्त खेती को प्रोत्साहन मिल रहा है। साथ ही, राज्य सरकार ने रसायन मुक्त खेती के लिए इस वर्ष 1 जून से खेत बचाओं अभियान की भी शुरुआत की है। जिसके बेहतर परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
राज्य के सभी 38 जिलों में पहले से 20 हजार हेक्टेयर में प्राकृतिक खेती हो रही है, जिससे करीब 50 हजार किसान जुड़े हैं। किसानों को समय पर इनपुट मिल सके, इसके लिए 266 बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर स्थापित किए गए हैं। साथ ही किसानों को जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और अग्नि अस्त्र जैसे जैविक घोल बनाने का प्रशिक्षण भी दिया गया है।
रोहतास, नालंदा और पटना सहित कई जिलों में किसानों ने इस तकनीक को तेजी से अपनाया है। इससे न सिर्फ उत्पादन बेहतर हुआ है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रति फसलों की सहनशीलता भी बढ़ी है। इस तकनीक से धान, गेहूं के साथ-साथ टमाटर, बैंगन, भिंडी, गोभी, मिर्च जैसी सब्जियां और ड्रैगन फ्रूट, अमरूद, पपीता, केला जैसे फलों की भी खेती की जा रही है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की शुरुआत 2025 में की थी और बिहार में इसके उत्साहजनक परिणाम देखने को मिल रहे हैं।