बेतिया : किशुन देव पंडित, दिनेश पंडित व दिनेश प्रजापती के हाथों से बने दीये और मिट्टी के बर्तन पूर्वी चंपारण से नेपाल तक पहुंचते हैं। मिट्टी के दीये खरीदकर स्थानीय कारीगरों का हौसला बढ़ाएं। पश्चिमी चंपारण क्षेत्र के पंचायत के अहवर कुड़ियां के मुखिया पति किशुन देव पडित के घर दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। घर-आंगन को रोशन करने के लिए लोग दीये और सजावटी सामान की खरीदारी में जुटने लगे हैं।
मझौलिया व लौरिया प्रखंड के कुम्हार भी अपनी पुश्तैनी कला को संवारने में दिन-रात एक कर रहे हैं
वहीं, इस पर्व को लेकर मझौलिया व लौरिया प्रखंड के कुम्हार भी अपनी पुश्तैनी कला को संवारने में दिन-रात एक कर रहे हैं। मिट्टी को आकार देकर दीये और बर्तन तैयार करने वाले इन कारीगरों के लिए दीपावली केवल त्योहार नहीं, बल्कि साल भर की मेहनत को बाजार तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। अहवर कुड़िया पंचायत मुखिया पति किशुन देव पंडित, दिनेश पंड़ित व दिनेश प्रजापती इन दिनों दीपावली की तैयारियों में व्यस्त हैं। उनके घर पर मिट्टी के दीये और विभिन्न प्रकार के बर्तन बनाने का काम तेजी से चल रहा है।
किशुन, दिनेश व दिनेश ने कहा- मिट्टी के बर्तन और दीये बनाना उनके परिवार का पुश्तैनी पेशा है
किशुन देव पंड़ित, दिनेश पड़ित व दिनेश प्रजापती बताते हैं कि मिट्टी के बर्तन और दीये बनाना उनके परिवार का पुश्तैनी पेशा है। कई पीढ़ियों से उनका परिवार इसी कला के सहारे आजीविका चलाता आ रहा है। हालांकि, बदलते दौर में चाइनीज लाइट और आधुनिक सजावटी सामान के बढ़ते प्रचलन से पारंपरिक दीयों के कारोबार पर असर पड़ा है।इसके बावजूद उन्होंने अपनी परंपरा को छोड़ने के बजाय उसे आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है। उनके हाथों से तैयार मिट्टी के दीये और बर्तन पूर्वी चंपारण के साथ नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचते हैं। त्योहार के दिनों में वे अधिक से अधिक दीये तैयार करने के लिए लगातार मेहनत करते हैं, ताकि दीपावली पर लोगों के घरों में मिट्टी की लौ जगमगा सके।
किशुन देव पंडित ने लोगों से अपील की कि दीपावली पर मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता दें
किशुन देव पंडित ने लोगों से अपील की कि दीपावली पर मिट्टी के दीयों को प्राथमिकता दें। इससे स्थानीय कुम्हारों की मेहनत को सम्मान मिलेगा और उनकी रोजी-रोटी को भी सहारा मिलेगा। वही इस संबध मे आचार्य मार्कण्डेय नाथ तिवारी ने बताया कि मिट्टी के दिये जलाना केवल परंपरा निभाना नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और स्वदेशी विरासत को संजोने का भी प्रयास है। मिट्टी इस पृथ्वी का सबसे शुद्ध पदार्थ माना जाता है , लोगों के सहयोग से ही कुम्हारों के घरों में भी खुशियों का दीप जल सकेगा।
बेतिया से परवेज आलम की रिपोर्ट